जाहिल
ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था, थोड़ा जाहिल थोड़ा गवार थोड़ा बेगाना ही अच्छा था।। ना झूठ तेरे अंदर था, ना तू झूठ से घिरा था। ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।। ना राम था, ना अल्लाह था, ना मजहब था, ना मंदिर था। ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।। ना घर्म तेरा धंधा था, ना तू मजहब का दिवाना था, तू तो बस इन्सानियत का ज्ञाता था। ऐ इन्सान तू पुराना ही प्यारा था।। मुर्दा चीज से प्यार तुझे, और जिन्दा जैसे भार तुझे। ऐ इन्सान ये हो क्या चला है तुझे।। कभी झूठ बोलकर भी तुझे चैन ना था, ...