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जाहिल

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ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था,                   थोड़ा जाहिल थोड़ा गवार  थोड़ा बेगाना ही अच्छा था।।                         ना झूठ तेरे अंदर था,                     ना तू झूठ से घिरा था। ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।। ना राम था, ना अल्लाह था,                    ना मजहब था, ना मंदिर था। ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।। ना घर्म तेरा धंधा था, ना तू मजहब का दिवाना था,                      तू तो बस इन्सानियत का ज्ञाता था। ऐ इन्सान तू पुराना ही प्यारा था।। मुर्दा चीज से प्यार तुझे,                     और जिन्दा जैसे भार तुझे। ऐ इन्सान ये हो क्या चला है तुझे।। कभी झूठ बोलकर भी तुझे चैन ना था,                     ...

वो लड़की

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वह एक लड़की थी,   जो कम उम्र में बड़ी हो गई। जो कुछ ही साल में सयानी हो गयी, वो एक लड़की थी,जो कल छोटी और आज बड़ी हो गयी। माँ की जगह ले, उसने घर को सम्भाल लिया, पिता के ना होते, उसने जिम्मेदारियों को सम्भाल लिया। कल वह छोटी सी लड़की हुआ करती थी, जिसे आज जिम्मेदारियों ने बड़ा बना दिया।  दुनिया उस गति से आगे बढ़ गई, पर वो वहीं थम सी गई। सब आगे बड़ चले एक तेजी के साथ, वह वहीं थम गई एक मायुसी के साथ। उन ठंडी हवाओं में, अपनी खुशिया समेटे। और मायुसी की एक चादर लपेटे, आगे की ओर अब चल दी वो। अब वो मासुम सा चहरा,दब सा गया है, अब वो बचपना कहीं, छिप सा गया है। उसने इस अघेरे मे उजाला जला लिया है, अपनी उम्र का लिहाज ना कर,अपना वचपना छिपा लिया।                                                               - प्राची रतुडी