जाहिल


ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था,
                  थोड़ा जाहिल थोड़ा गवार 
थोड़ा बेगाना ही अच्छा था।।
                      
 ना झूठ तेरे अंदर था,
                    ना तू झूठ से घिरा था।
ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।।

ना राम था, ना अल्लाह था,
                   ना मजहब था, ना मंदिर था।
ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।।

ना घर्म तेरा धंधा था, ना तू मजहब का दिवाना था,
                     तू तो बस इन्सानियत का ज्ञाता था।
ऐ इन्सान तू पुराना ही प्यारा था।।

मुर्दा चीज से प्यार तुझे,
                    और जिन्दा जैसे भार तुझे।
ऐ इन्सान ये हो क्या चला है तुझे।।

कभी झूठ बोलकर भी तुझे चैन ना था,
                     आज घर उजाड़कर मानो मोक्ष तुझे। 
ऐ इन्सान ये क्या हो चला है तुझे।।

कभी तू भी अपने मन का गान गाता था,
                           कभी तू भी एक मस्त मौला दीवाना था।
ऐ इन्सान क्या हो चला तुझे।।

पन्नो में नहीं था सच छिपा,
                       तू खुद ही सच का स्वरुप था।
ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।।

आदम बना आया था तू,
                   तब जिन्दा दिल कहलाया था।
ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।।

तब साफ ना थी सुरत तेरी,
                   ना  मन में कोई मैल था।
ऐ इन्सान तू पुराना ही अच्छा था।।

राजनीति का तू स्वयम् ज्ञाता था,
                    तू खुद ही खुद को चलाता था।
ऐ इन्सान तु पुराना ही प्यारा था।।
                                                        -प्राची रतुडी 





                                                


                    

                      

Comments

  1. Kya baat..
    Great start....❤️��

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  2. Great start..
    Fabulous writing ❤️👍

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  3. This comment has been removed by the author.

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